“वे लोग बड़े खूबसूरत होते है, जो बिन स्वार्थ, गैरो को भी अपना समझ लेते है। महज़ बात करे अगर अपनों की, तो आजकल अपने ही अपनों से मुँह फेर लेते है। बचपन में थामते थे जिन उंगलियों को बड़े होकर उनकी ही लाठी, निर्लजता से छीन लेते है। और दोहराय नहीं इसमें, की ये ही वो लोग है जो जीते-जी, अपनों का ही गला घोट देते है। दिल जब टूटता है तो, दोष उस मासूम का नहीं होता फ़क़त, उन संवेदनाओ का है जो वो किसी अपने से कर बैठता है। खैर, मैं बात कर रहा था अपने अज़ीज़ दोस्तों की ये वो लोग है जो गर्दिशो में भी, सबसे आगे खड़ा हुआ करते है।” : संदीप शिवहरे