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Showing posts from June, 2019

मत डूबों किसी की निगाहों में

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“मत डूबों किसी की निगाहों में, तैर नहीं पाओगे तुम इन राहों में अक्सर लड़खड़ा जाते हैं पैर, जब-जब परखा गया है प्रेम को धाराओं में।“ : संदीप शिवहरे

बचपना जो तुममे है

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“बचपना जो तुममे है, उसे बस यूंही बरकरार रखना बात निगाहों से करना और होंठों पर मीठी सी मुस्कान रखना।“ : संदीप शिवहरे

कभी कुछ काम दिल की ख़ुशी के लिए भी किया करो

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" कभी कुछ काम दिल की ख़ुशी के लिए भी किया करो कभी प्यासे को पानी तो कभी किसी की मदद किया करो। मंदिर में अगरबत्ती लगाने से सिर्फ भगवान् नहीं मिलते तुम श्रद्धा के नाम पर , किसी फ़कीर को भोजन दिया करो। और जितनी आवश्यकता हो , सामान सिर्फ उतना ही लिया करो बर्बाद करते समय , किसी गरीब के बारे में भी सोचा करो। कभी कुछ काम दिल की ख़ुशी के लिए भी किया करो कभी प्यासे को पानी तो कभी किसी की मदद किया करो। " : संदीप शिवहरे

पाकर तुम्हे

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“पाकर तुम्हे जिंदगी आसान सी लगती है, हो चाहे जितनी भी बड़ी समस्या सच कहूं तो, तुमसे मिलकर हर समस्या चुटकी मे सुलझ जाती है।“ : संदीप शिवहरे

वृक्ष हमारे जीवन में

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"वृक्ष हमारे जीवन में, सुन्दर, महत्वपूर्ण भाग; वृक्षों के कारण मुमकिन है स्वच्छ पवन की आस।" :संदीप शिवहरे

बीजों को रोपित कर

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"बीजों को रोपित कर नये पौधों का निर्माण करो  सृष्टि के इस चक्र में थोड़ा तुम भी योगदान करो। प्रदूषण की इस मार में थोड़ी जीने की राहत दो  लोग, खुली हवा में चल सके तुम ऐसा कुछ समाधान करो। अरे, वृक्षों से ही जीवन है तुम उनको मत साफ करो अपने मतलब के लिए तुम उनका मत विनाश करो। बीजों को रोपित कर नये पौधों का निर्माण करो  सृष्टि के इस चक्र में थोड़ा तुम भी योगदान करो।" : संदीप शिवहरे

बहुत खूबसूरत है तुम्हारी निगाहें

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“बहुत खूबसूरत है तुम्हारी निगाहें इन पर ग़ज़ल लिखने का दिल करता है पता है, हो तो नहीं, तुम किस्मत हमारी हां, पर तुम्हे पढ़ने का दिल करता है।“ : संदीप शिवहरे

तुम जो कह दो तो

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तुम जो कह दो तो, वो कभी गलत कैसे हो सकता है आखिर तुम्हारी बातों पर तो, हमारा दिल भी झुकता है।   : संदीप शिवहरे

बहुत कम मिलते हैं इंसान

बहुत कम मिलते हैं इंसान इस जहां मे जो दूसरों को बस खुश देखना चाहते हैं वरना शहर का हाल तो कुछ यूं है कि अपनो के खुशी के पीछे अपने ही पड़े है। : संदीप शिवहरे

खूबसूरती जो दबा दी है लोगों ने

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खूबसूरती जो दबा दी है लोगों ने, नये चलन के आगे आज भी कद्रदार निकाल लाते है सुखे गुलाबो को किताबों से। : संदीप शिवहरे

अगर आप रुठे है तो

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अगर आप रुठे है तो कोई नहीं, हम मना लेंगे अरे, बात ही तो बिगड़ी है फिर से बना लेंगे। : संदीप शिवहरे

दर्द छिप रहा है तो

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दर्द छिप रहा है तो उसे छिपाने दो जनाब आंखो में न झांकिए, इन्हे झूठा ही मुस्कुराने दो जनाब। : संदीप शिवहरे

मजाक ये नहीं है कि

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मजाक ये नहीं है कि उन्होंने मेरी मोहब्बत को भुला दिया मजाक तो ये है कि उन्होंने मेरी दोस्ती, मेरी शरारतों को भी भुला दिया। : संदीप शिवहरे

अजीब इज़्तिराब है उनसे मिलने की

"अजीब इज़्तिराब है उनसे मिलने की पर ये शाम है कि ढलती नही। रात भर करवट बदलते रहते है बूँद है कि समुन्दर से मिलती ही नही। हर रोज सोचते है उनसे बात करने को पर ये बन्द जुबॉ खुलती ही नही। दिल देखकर झूम जाता है जिन्हे ये आरजू है कि मिटती ही नही। और अफसाने मेरे झूठे ही सही पर उमंगे है कि थमती ही नही। अफसाने मेरे झूठे ही सही पर उमंगे है कि थमती ही नही।।" : संदीप शिवहरे

बातो मे इनायत रखते है तो

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"बातो मे इनायत रखते है तो हर शक्श हँसी लगता है। रुप रंग मे क्या रखा हर शक्श मे खुदा बसता है।।" : संदीप शिवहरे

रिश्तो की महफिल मे

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" रिश्तो की महफिल मे अपने ही अपनो के पीछे पडे हैं कौन किस पर भरोसा करे इस बात मे उलझे पडे हैं। माँ-बाप की जायदाद पर बडी शान से हक जताते हैं बुढ़ापे मे कलह मचाकर उन्हे खून के आँसू रुलाते हैं। खुद तो भौहे ताने रंगबाजी मे कॉलर उठाये होटल जाते है और अपने ही कुटुंब को तिल-2 तडपाकर भूखे पेट सुलाते हैं। एक भाई कहता माँ जब तक हैं, तब तक है तेरा मेरा साथ माँ जिस दिन गये, समझ खण्ड-2 हो गया रिश्तो का बाज़ार। दूसरा सोचता कब मरे तो सारी जायदाद मेरी हो, और तीसरा कहता कि जल्दी अब देहरी मे दीवार खडी हो। रिश्तो की महफिल मे अपने ही अपनो के पीछे पडे हैं कौन किस पर भरोसा करे इस बात मे उलझे पडे हैं।।" : संदीप शिवहरे

लोग अक्सर अपने घरों पर दीये जलाते है,

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"लोग अक्सर अपने घरों पर दीये जलाते है, घर मे पल रहे विवादों को खुद भडकाते है, मकसदी हो गये है अब मनसूबे इनके, मतलब हो तो राम या अल्लाह बुलाते है।" : संदीप शिवहरे

वे लोग बड़े खूबसूरत होते है, जो

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“वे लोग बड़े खूबसूरत होते है, जो बिन स्वार्थ, गैरो को भी अपना समझ लेते है। महज़ बात करे अगर अपनों की, तो आजकल अपने ही अपनों से मुँह फेर लेते है। बचपन में थामते थे जिन उंगलियों को बड़े होकर उनकी ही लाठी, निर्लजता से छीन लेते है। और दोहराय नहीं इसमें, की ये ही वो लोग है जो जीते-जी, अपनों का ही गला घोट देते है। दिल जब टूटता है तो, दोष उस मासूम का नहीं होता फ़क़त, उन संवेदनाओ का है जो वो किसी अपने से कर बैठता है। खैर, मैं बात कर रहा था अपने अज़ीज़ दोस्तों की ये वो लोग है जो गर्दिशो में भी, सबसे आगे खड़ा हुआ करते है।” : संदीप शिवहरे

मैं वो शक्श हू

"मैं वो शक्श हू जो बिन इत्र महकता हू काल्पनिक नही वास्तविक बाते करता हू। अक्सर लोग कट जाते है मेरे इस अंदाज से मैं जवाँ दिल की खूबसूरत बाते करता हू। भली-भांती जानता हू कि सादगी है क्या मैं चेहरे पर शब्दो का श्रृँगार कर निकलता हू।।" : संदीप शिवहरे

लोग मजहब या धर्म को मुल्क और वतन मे बाँटते क्यो हैं

“लोग मजहब या धर्म को मुल्क और वतन मे बाँटते क्यो हैं और गले मिलने से पहले ही, राजनीति हर जगह लगाते क्यो हैं। बारूद के ढ़ेर मे बैठकर क्यो बनाना चाहते है मकाँ अमन का गर मनसूबे है उनके जिहाद के नाम पर लोगो की हत्या करना। क्यो कुरान और गीता की आयतों और श्लोको को खड़ा कर देते है कठघरे मे गर विष ही घोलना है लोगो के ज़हन मे, तो भाईचारे की बातें करते क्यो है। अक्सर देखा है लोगो को, उतर आते है किसी मासूम के रेप के बाद सडको पर, मै पूछता हू वारदात के वक्त क्यो बन्द होते है, सारे के सारे दरवाजे उपस्थित लोगो के दिलो के। लोग मजहब या धर्म को मुल्क और वतन मे बाँटते क्यो हैं और गले मिलने से पहले ही, राजनीति हर जगह लगाते क्यो हैं।।“ : संदीप शिवहरे

बात जो निकली, कही तलक

"बात जो निकली, कही तलक लबों पर अटक गयी पर देख शबाहत महज़बी की मुखडे मे बदल गयी।।" : संदीप शिवहरे

ऐ महजबी

'ऐ महजबी, इस दिल मे चाहत बेशुमार है सच कहे तो तेरे दीदार का कब से इन्तजार है। बहुत आंख मिचौली खेलना सीख गये हो कोई नहीं, हमे भी बस एक मौके का इन्तजार है। जायज है तुम्हारा अपने हुस्न पर इतना बलखाना आखिर लडकी हो, गहना ही है तुम्हारा शरमाना। चलो कोई बात नही, रुठे हो, हम मना लेंगे बात ही तो बिगडी है फिर से सुलझा लेंगे। देखो फलक पर बैठा चांद खुद पर कैसे इत्तरा रहा है ज़िक्र क्या किया तुम्हारा, अन्दर ही अन्दर जला-भुंझा जा रहा है। सच, बहुत कुछ है कहने को, बहुत प्यार है जताने को टूटे हुये कांच के टुकडे लिये बैठे है कब से हम मिजाज कुछ ऐसा है शीशमहल बनाने को। मिजाज कुछ ऐसा है शीशमहल बनाने को'।। - संदीप शिवहरे

बैठ विचार न कीजिये

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"बैठ विचार न कीजिये, काम करें सब होय। तृण से बने घरौंदा, एक तृण कुछ न होय।।" : संदीप शिवहरे

सोच मन अति व्याकुल है

"सोच मन अति व्याकुल है कि कल कैसा होये टुकड़ों में बंट गया अब किससे दुखड़ा रोये। खिलखिलाती मुस्कान, कहीं बन्द है, एक कमरे में किसने कितना प्यार दिया सोचती है मन-ही-मन में। यहां टंगी थी उनकी तस्वीर अब वो कहां गयी बंटवारे में क्या, वो भी दूर चली गयी। सोच मन अति व्याकुल है कि कल कैसा होये टुकड़ों में बंट गया अब किससे दुखड़ा रोये।।" : संदीप शिवहरे

पीड़ा से क्या डरना

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“पीड़ा से क्या डरना, ये सरल सुखद मार्ग एक मार्ग जे खुल गया, भवसागर ते पार।।“ : संदीप शिवहरे

माँ, तुम, मेरी जननी

"माँ, तुम, मेरी जननी तुम, ही मेरा आधार करुणा की अविरत बहती धारा सा, शीतल तेरा प्यार। ममतामयी, तुम जगदम्बा हो सहज, सरल, धड़कता ज्योती अग्निगंधा हो।" संदीप शिवहरे

माँ " मेरी दुनियॉ

"माँ " मेरी दुनियॉ ममता की मूरत स्नेह की पराकाष्ठा माँ, मेरी दुनियॉ......। माँ के होने पर हलचल, हरा-भरा मेरा घर न होने पर बेजान, खोखला और खण्डहर मेरा घर। माँ घर पर, तुलसी का जैसे वृक्ष बरगद की छाया गंगा जैसा निर्मल जल। नन्हे-नन्हे डगमगाते कदमो को माँ ने ही चलना सिखाया सच बोलू तो माँ ने भली भाँति सम्भलना सिखाया। दिन भर की थकान से हो जाता जब मै चूर, माँ लगाती हाथ जरा हो जाती सारी पीर चूर। खुद भूखी रहकर हमे भर-पेट भोजन कराती, हमे खुश देखने को अपनी सारी वेदना छिपाती। जब देखती अगर पीढा मे हमे वो आकर मेरे बालो को सहलाती, हमे समझाती कुछ गीत और लोरीयॉ सुनाती माँ, मेरी दुनियॉ......। माँ के ज्ञान और समझ से बढकर दूसरा कोई न वेद, माँ, ममता का अथाय-सागर माँ मे ही सारे देव। : संदीप शिवहरे

नखरीली सुबह ओस की बूँदे लिये,

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"नखरीली सुबह ओस की बूँदे लिये, पत्तो से टपक रही थी कही औंधे मूह बिस्तर मे तो कही बौछार बन बरस रही थी। कल-2 करती नदियो की ध्वनि चारो दिशा मे गूँज रही थी मानो मिट्टी की सौंधी-2 खुशबू जैसे हवा मे घुल रही थी। चाँद था कि बादलो मे बडी तेजी से छिप रहा था और सूरज अंगडाई लेते दबे पाव निकल रहा था ठण्डी-2 हवाऐ मेरे बदन को छूकर जा रही थी मानो, चाय की प्याली की भीनी-2 सी खुशबु मेरे नाक मे छा रही थी। छोटे-2 बच्चे, धमा चौकडी करते नन्हे-2 कदमो के साथ स्कूल जा रहे थे कुछ बस्तो मे सपने, तो कुछ किताबो का बोझ उठा रहे थे। नखरीली सुबह ओस की बूँदे लिये, पत्तो से टपक रही थी कही औंधे मूह बिस्तर मे तो कही बौछार बन बरस रही थी।" : संदीप शिवहरे

कुछ लफ्जो से नही बयॉ हो सकता

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"कुछ लफ्जो से नही बयॉ हो सकता मित्रता नाम का इकलौता शब्द ये उतना ही सुन्दर, गहरा रिश्ता है, जैसे फूल और सुगन्ध।।" : संदीप शिवहरे

“एक रोज़ वो मुझसे अचानक पूछा पड़े

“एक रोज़ वो मुझसे अचानक पूछा पड़े क्या मैं सच में इतनी सुन्दर हू जो तुमको इतनी मनभावन हू फिर क्या था 'संदीप' तो ‘संदीप', बोल पड़ा हीरे से तो आज तक हीरा भी अंजान है वरना क्यो रहता वो यूं कोयले के समान हैं।“ : संदीप शिवहरे

वो ‘तेज़' मेरे मुख का

“ आलोक हो जैसे चन्द्र का बिखर जाता मुस्कान में मेरी जब-जब याद आता नाम उसका।“ : संदीप शिवहरे

आंखे जब-2 खुले मेरी

आंखे जब-2 खुले मेरी सामने दीदार तेरा हो दर्पण जो देखूं तो उस पर श्रृंगार तेरा हो। पाकर तुझे सामने झूम उठे मेरा भी दिल चांद तारों की ख्वाईशे नहीं रखता बस हर रोज दीदार तेरा हो।। : संदीप शिवहरे

दिल जीत लें

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दिल जीत लें ऐसे वार करते हैं हम, चाकू, छुरियां, खंजर वंजर नहीं बातों से हिसाब करते हैं हम। : संदीप शिवहरे

जो दिल में बसता हो

"जो दिल में बसता हो उसे आंखों/छन्नी से क्या देखना जो दर्पण में हो उसके लिए श्रृंगार क्या करना। ये चांद तारे, ये रोशनी सब उनसे ही तो है तो फिर खुद को उनसे क्यो अलग समझना।। : संदीप शिवहरे

गमों को साईड में रखिए

गमों को साईड में रखिए मुस्कुराहट बेहिसाब रखिए। रुप-रंग में कुछ नहीं रखा जनाब, रूह से प्यार कीजिए। दिन जो बीत गए, मत सोचिए नये जीवन का दिल से इस्तकबाल कीजिए। : संदीप शिवहरे

मुस्कुराहट छीनकर मत हंसो, गरीब की

“मुस्कुराहट छीनकर मत हंसो, गरीब की ख्वाईश उनकी भी है खुले आसमान में जीने की सुना है बहुतों को शौक है कमजोरों पर सितम ढ़ाने की मत भूलों कलम से ऊंची आवाज नहीं किसी की।।“ : संदीप शिवहरे

मैं-मैं करै कितने जन

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“मैं-मैं करै कितने जन, मैं का कोई न अंत एक मैं धृतराष्ट्र किये, खत्म हुआ कुरु वंश।। खत्म हुआ कुरु वंश, मैं से टूटा सर्व घमण्ड धर्मयुद्ध में फिर हुआ, सत्य का परच म बुलंद।। कुरुक्षेत्र में हंसा, ठठाके मार-मार 'मैं' कितने कुरु मर मिटे, शान से करते 'मैं-मैं'।।“ : संदीप शिवहरे

बहुत मुश्किल होता है

“बहुत मुश्किल होता है हर रोज दिल को समझाना उसे ये अहसास कराना कि ‘सब कुछ' ठीक है।“ : संदीप शिवहरे

तस्वीर देख तुम्हारी

तस्वीर देख तुम्हारी तस्वीर हो गया हू मुस्कुराहट जो बिखरी आज सच, कायल हो गया हू। : संदीप शिवहरे

वो नफा मुनाफे की सोच रखते हैं

वो नफा मुनाफे की सोच रखते हैं और हम शकून की तलब रखते हैं जिंदगी ऐसी ही है वो बस रुलाना जानती है और हम गम में भी मुस्कुराकर चलना जानते है। : संदीप शिवहरे

सुना है, तुम

"सुना है, तुम रोज आईने के सामने घण्टों सजते-संवरते थे सब कहते थे कि तुम बहुत ही खूबसूरत लगा करते थे, और राज की बात, हम भी पागल थे उन दिनों तुम्हारी एक झलक पाने को सच, तुम्हें देखने को न जाने कितने घंटे छत पर टहला करते थे।" : संदीप शिवहरे

बेज़ार होके बैठे हैं

“बेज़ार होके बैठे हैं हमसे वो इस कदर जैसे रूठ गया हो दर्पण आज खुद से ज़बर संदल जैसी खूबसूरत हंसी-ठिठोलियां है उनकी कभी कहर भी बरसाया हम पर तो होके मुख़र।“ : संदीप शिवहरे

दुश्मन से भी मिलों तो

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दुश्मन से भी मिलों तो मुस्कुराहट साथ रखो मीठा न सही तो न सही, अल्फ़ाजो से ही निहाल दो। : संदीप शिवहरे

भींगी आंखों से

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“भींगी आंखों से भारत मां पूंछ रही सत्ता के गलियारों से कि कब तक यूं फेसबुक और ट्विटर में तर्क-वितर्क में समय गवाओगे देशभक्ति के झूठे नारे और लोगों में झूठी अलख जगाओगे आखिर कितना और खाओगे और ये बताओ, कहां बचाकर ले जाओगे। दोषी चाहे जो भी हो- देश के अंदर हो या बाहर हो आखिर तुम सब कब तक, यूंही मेरे बेटों की शहादत पर शोक मनाओगे नहीं, ये वक्त नहीं है रोने का, आपस में तर्क-वितर्क और संवाद का ये वक्त है साथ मिल खड़े होने का, उनकी शहादत का बदला लेने का। इस बार तुम देना ऐसा जवाब दुश्मन को कि उसकी रूह भी कांप जाए जिहाद आखिर क्या होता है उसका मतलब वो भली-भांति समझ जाए और जंग का इतना ही शौक है उन्हे, तो एक बार वीरों को सरहद में ललकारें हर एक शेर सौ-सौ पर भारी पड़ेगा, वो इतना अच्छे से गांठ बांध लें। भींगी आंखों से भारत मां पूंछ रही सत्ता के गलियारों से कि कब तक यूं फेसबुक और ट्विटर में तर्क-वितर्क में समय गवाओगे देशभक्ति के झूठे नारे और लोगों में झूठी अलख जगाओगे आखिर कितना और खाओगे और ये बताओ, कहां बचाकर ले जाओगे।।“ : संदीप शिवहरे

घर की शांति और समृद्धि के लिए।

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 "घर की शांति और समृद्धि के लिए घर की बागडोर बड़े-बुजुर्ग को थामनी होगी वरना घर में जितने अधिक बर्तन होंगे आए दिन, उतनी ही अधिक खटपट  होगी।" : संदीप शिवहरे

देखकर मुस्कुराहट तुम्हारी

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“देखकर मुस्कुराहट तुम्हारी दिल को सुकूं मिलता है हर्फ़-दर-हर्फ संजोकर ग़ज़ल लिखने का दिल करता हैं लेकिन सोचता हूं क्या लिखूं तुम पर, तुम्हारी सुंदरता पर कितने तो पृष्ठ भर चुका, पर न जाने क्यों कम ही लगता है।“ : संदीप शिवहरे

गर साथ-2 उडना चाहते है ये परिंदे

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“गर साथ-2 उडना चाहते है ये परिंदे, तो इन्हे उडने दो बात मोहब्बत की है तो, इन्हे मोहब्बत करने दो।“ : संदीप शिवहरे

वो मोहब्बत ही क्या

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"वो मोहब्बत ही क्या जिसमे तकरार न हो बात हो, लेकिन दिल में एतबार न हो। : संदीप शिवहरे

जीता जागता, हंसी ख्वाब हो तुम

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जीता जागता, हंसी ख्वाब हो तुम मेरे चेहरे का नूर और अधरो की मुस्कान हो तुम। : संदीप शिवहरे

काश, आपने एक बार ही मेरे बारे में सोचा होता

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काश, आपने एक बार ही मेरे बारे में सोचा होता, अच्छा लगता गैरों की इस महफिल में आखिर कोई तो, अपना लगता। : संदीप शिवहरे

प्रेम सच्चा हो तो

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प्रेम सच्चा हो तो अदम्य साहस बन उमड़ जाता है अनृत प्रेम तो वक्त के साथ बदल जाता है। : संदीप शिवहरे

सफल व्यक्ति की बेवकूफियां भी हंसी लगती है

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सफल व्यक्ति की बेवकूफियां भी हंसी लगती है असफल व्यक्ति की गलतियां, तो दूर से ही दिखती है। : संदीप शिवहरे

यारों, कमरे बड़े नहीं होते

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यारों, कमरे बड़े नहीं होते, दिल बड़ा होता है दो गज जमीं के लिए, किसी का घर छोटा नहीं होता है। : संदीप शिवहरे

दिल की शरारतों को

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दिल की शरारतों को दबा कर दिल में नहीं रखते ख्वाइशो के संदूक हर वक्त बन्द करके नहीं रखते। : संदीप शिवहरे

बुराई की राह में

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बुराई की राह में एकदिन, हर शख्स भटक जाता है, और सच की जटिल राह में इंसान, फूल बन महक जाता है। : संदीप शिवहरे

रूप-रंग से प्रेम किया

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रूप-रंग से प्रेम किया, कांटे लगे हाथ एक गलती महंगी पड़ी, टूटा आत्मविश्वास। : संदीप शिवहरे

सौन्दर्य की अपनी एक अलग परिभाषा है

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" सौन्दर्य की अपनी एक अलग परिभाषा है जिसे केवल लोगों ने शब्दों में ही आंका है सौन्दर्य तो निराकार है, गुण और सरस वाणी का प्रकार है सौन्दर्य बहन का निश्छल प्रेम और मां का दुलार हैं।" : संदीप शिवहरे

ज़ुल्फ़े गिरकर मुझ पर

"ज़ुल्फ़े गिरकर मुझ पर दिन को रात कर दो अपने लबों से चूमकर, आज प्यार का आगाज कर दो।" : संदीप शिवहरे

हृदय पर भार मत रखिए,

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“हृदय पर भार मत रखिए, हृदय कोमल अंग। अपनो संग बांट लीजिए, गहरे तगड़े जख्म।“ : संदीप शिवहरे

व्यस्त हो गया है जीवन

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“व्यस्त हो गया है जीवन, घर और ऑफिस के काम में अपनों के लिए भी समय नहीं, लोगों के पास इस जहां मे।“ : संदीप शिवहरे

एक आंसू गिरा जमीं पर और चिल्ला कर पूछ पड़ा

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एक आंसू गिरा जमीं पर और चिल्ला कर पूछ पड़ा क्या दिल से नहीं की थी मोहब्बत तुमने, उनसे। : संदीप शिवहरे