वैसे तो ये है अल्फ़ाज़ शायरी के

“वैसे तो ये है अल्फ़ाज़ शायरी के जो मैं तुम्हें सुनाता हूं
लेखक हूं जनाब, पर शायरी भी लाजवाब सुनाता हूं।

पति जो पत्नी से ग्रस्त हैं आज उनके मर्ज की दवा बताता हू
नींबू मिर्च लटकाने से कुछ नहीं होगा, समर्पण बतलाता हूं।

झाड़ू-कटके से बचना हो तो खुद को जितना हो व्यस्त रखो
जैसे दिखे धर्मपत्नी पट से जानू कहकर संबोधित करो।

अच्छा भोजन करना हो तो पत्नी के खाने की बुराई कभी न करना
जला-कुचा जो मिले, चुपचाप मैकडोनाल्ड का बर्गर समझ खा लेना।

‘पत्नी शरणम् गच्छामि' का सोते-जागते, हर पहर नारा लगाना
और सुकूनभरी नींद लेनी हो तो सदैव पत्नी को ही श्रेष्ठ बताना।“
: संदीप शिवहरे

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