बेज़ार होके बैठे हैं

“बेज़ार होके बैठे हैं हमसे वो इस कदर
जैसे रूठ गया हो दर्पण आज खुद से ज़बर
संदल जैसी खूबसूरत हंसी-ठिठोलियां है उनकी
कभी कहर भी बरसाया हम पर तो होके मुख़र।“
: संदीप शिवहरे

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