"बड़े होने की होड़ में, बचपना कैसे भूल जाऊ
माँ, तेरी गोद में, सर रख; सोना कैसे भूल जाऊ।
बचपन से अब तक मैं, तेरी ऊँगली पकड़कर ही चला हूँ
किसी और के आ जाने पर, मैं तेरा कमरा कैसे भूल जाऊ।
माँ, तेरी गोद में, सर रख; सोना कैसे भूल जाऊ।
बचपन से अब तक मैं, तेरी ऊँगली पकड़कर ही चला हूँ
किसी और के आ जाने पर, मैं तेरा कमरा कैसे भूल जाऊ।
माँ, जब भी मैं बिस्तर पर लेटा, पीड़ा तुम्हे अधिक हुयी है
तुम्हारा मुझे छाती से लगाना, मैं वो यादे कैसे भूल जाऊ।
अपनी थाली का भोजन, अपने हाथो से हमे खिलाना
माँ, वो स्नेह, वो अनुराग के क्षण, मैं कैसे भूल जाऊ।
माँ, सच में नहीं देखी मैंने, दयालुता; तेरे जैसी चहुँ ओर
हर गलती को माफ़ किया, मैं तेरी उदारता कैसे भूल जाऊ।
बड़े होने की होड़ में, बचपना कैसे भूल जाऊ
माँ, तेरी गोद में, सर रख; सोना कैसे भूल जाऊ।"
: संदीप शिवहरे
तुम्हारा मुझे छाती से लगाना, मैं वो यादे कैसे भूल जाऊ।
अपनी थाली का भोजन, अपने हाथो से हमे खिलाना
माँ, वो स्नेह, वो अनुराग के क्षण, मैं कैसे भूल जाऊ।
माँ, सच में नहीं देखी मैंने, दयालुता; तेरे जैसी चहुँ ओर
हर गलती को माफ़ किया, मैं तेरी उदारता कैसे भूल जाऊ।
बड़े होने की होड़ में, बचपना कैसे भूल जाऊ
माँ, तेरी गोद में, सर रख; सोना कैसे भूल जाऊ।"
: संदीप शिवहरे

Comments
Post a Comment