“आज बात हुई रंगो की,
कुछ रंग बिरंगे पतंगों की
गुलशन की, झीलो की,
गलियों-चौबारो की
और
खेत खलिहानों की।

सूरज की उगती किरण की
टिम टिम करते तारों की
मिट्टी की सौंधी खुशबू की
पंक्षियो के गाने की
और
कल-२ करती नदियों के पानी की।

बात हुई झिलमिल यादों की
कंचो की, बरसातों की
बस्तो मे छिपे खिलौनों की
बचपन की नादानी की
और
अल्हड़ रवानी की।

आज बात हुई रंगो की,
कुछ रंग बिरंगे पतंगों की
गुलशन की, झीलो की,
गलियों-चौबारो की
और
खेत खलिहानों की।“
: संदीप शिवहरे

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