नखरीली सुबह ओस की बूँदे लिये,

"नखरीली सुबह ओस की बूँदे लिये,
पत्तो से टपक रही थी
कही औंधे मूह बिस्तर मे
तो कही बौछार बन बरस रही थी।

कल-2 करती नदियो की ध्वनि
चारो दिशा मे गूँज रही थी
मानो मिट्टी की सौंधी-2 खुशबू
जैसे हवा मे घुल रही थी।

चाँद था कि बादलो मे बडी तेजी से छिप रहा था
और सूरज अंगडाई लेते दबे पाव निकल रहा था
ठण्डी-2 हवाऐ मेरे बदन को छूकर जा रही थी
मानो, चाय की प्याली की भीनी-2 सी खुशबु
मेरे नाक मे छा रही थी।

छोटे-2 बच्चे, धमा चौकडी करते
नन्हे-2 कदमो के साथ स्कूल जा रहे थे
कुछ बस्तो मे सपने, तो कुछ
किताबो का बोझ उठा रहे थे।

नखरीली सुबह ओस की बूँदे लिये,
पत्तो से टपक रही थी
कही औंधे मूह बिस्तर मे
तो कही बौछार बन बरस रही थी।"
: संदीप शिवहरे








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