मुस्कुराहट छीनकर मत हंसो, गरीब की

“मुस्कुराहट छीनकर मत हंसो, गरीब की
ख्वाईश उनकी भी है खुले आसमान में जीने की
सुना है बहुतों को शौक है कमजोरों पर सितम ढ़ाने की
मत भूलों कलम से ऊंची आवाज नहीं किसी की।।“
: संदीप शिवहरे

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