ऐ महजबी

'ऐ महजबी, इस दिल मे चाहत बेशुमार है
सच कहे तो तेरे दीदार का कब से इन्तजार है।

बहुत आंख मिचौली खेलना सीख गये हो
कोई नहीं, हमे भी बस एक मौके का इन्तजार है।

जायज है तुम्हारा अपने हुस्न पर इतना बलखाना
आखिर लडकी हो, गहना ही है तुम्हारा शरमाना।

चलो कोई बात नही, रुठे हो, हम मना लेंगे
बात ही तो बिगडी है फिर से सुलझा लेंगे।

देखो फलक पर बैठा चांद खुद पर कैसे इत्तरा रहा है
ज़िक्र क्या किया तुम्हारा, अन्दर ही अन्दर जला-भुंझा जा रहा है।

सच, बहुत कुछ है कहने को, बहुत प्यार है जताने को
टूटे हुये कांच के टुकडे लिये बैठे है कब से हम

मिजाज कुछ ऐसा है शीशमहल बनाने को।
मिजाज कुछ ऐसा है शीशमहल बनाने को'।।
- संदीप शिवहरे

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