लक्ष्मीबाई, एक वीरांगना और उनकी अविस्मरणीय जीवनगाथा।







लक्ष्मीबाई, एक वीरांगना और उनकी अविस्मरणीय जीवनगाथा।


“मातृभूमि की रक्षा करने, जन्मी एक मर्दानी थी
अदम्य साहस लेकर रण में कूदी भवानी थी
दूर फिरंगी को करने उसने मन में ठानी थी
जन-जन के सीने में आजादी की आग उसे भडकानी थी।


बचपन में ही मणिकर्णिका, सबकी प्रिय छबीली थी
भागीरथी और मोरोपंत की, संतान वह अकेली थी
पेशवा के राज्य में सीखी शस्त्रकला अलबेली थी
बरछी, ढ़ाल, कटार, कृपाण यही उनकी प्रिय सहेली थी।

मल्लविद्या, घुड़सवारी में भी न उनकी कोई हमजोली थी
शिवाजी महाराज की गाथाएं सुनकर बड़ी हुई छबीली थी
बूंद-बूंद रक्त कर दिया समर्पित, जिसने मातृभूमि के चरणों में
ऐसी रानी नहीं जन्मी फिर, भारतवर्ष के किसी और कोने में।

मातृभूमि की रक्षा करने, जन्मी एक मर्दानी थी
अदम्य साहस लेकर रण में कूदी भवानी थी
दूर फिरंगी को करने उसने मन में ठानी थी
जन-जन के सीने में आजादी की आग उसे भडकानी थी।

फिर गंगाधर का विवाह प्रस्ताव, पहुंचा पेशवा के दरबार
मोरोपंत सब सुन हर्षित हुए, रिश्ता किया स्वीकार
बिगुल बजे, ढ़ोल बजे, बजे एक-एक करके साज
रानी के विवाह में पुलकित आज पूरा मराठा साम्राज्य।

कदम पड़ते ही मनुकर्णिका के, खुल गये झांसी के भाग्य
एक-एक करके काले बादल छटने लगे, होने लगी प्रभात
नन्ही किलकारियों से गूंजने लगी महल की चार दीवारी
बिन ऋतु के बहार आयी, हर्षित आज फिर प्रजा सारी।

लेकिन जल्द ही झांसी का सूरज ढ़ूब गया घनी अंधेरी रातों में
काला साया फिर से मंडराने लगा, झांसी के स्वर्णिम सिंहासन में
तब महाराज गंगाधर राव नेवालकर ने लिया एक पुत्र को गोद
फिर झांसी सौंपी लक्ष्मीबाई को, छोड़ चल दिए स्वर्गलोक।

शुभ अवसर पाकर अंग्रेजों ने, झांसी पर अपना हक जताया
गोद निषेध नीति के तहत, दामोदर को उत्तराधिकारी ठुकराया
झांसी त्यागकर लक्ष्मीबाई ने, अपना निवास ‘रानी महल' बनाया
किन्तु अंग्रेजों के सामने, अपना मस्तक कभी नहीं झुकाया।

मातृभूमि की रक्षा करने, जन्मी एक मर्दानी थी
अदम्य साहस लेकर रण में कूदी भवानी थी
दूर फिरंगी को करने उसने मन में ठानी थी
जन-जन के सीने में आजादी की आग उसे भडकानी थी।

बनकर मसीहा झांसी की, लक्ष्मीबाई ने तलवार उठाई
मातृभूमि की रक्षा करने, महारानी स्वयं रण में उतर आई
कई दिनों तक लगातार झांसी के दुर्ग मे घनघोर युद्ध हुआ
रानी को संकट में पाकर झलकारी बाई ने रानी का वेश धरा।

रानी ‘बादल’ में सवार निकली सकुशल दुर्ग के पार
बादल ने फांदी थी आज, दुर्ग की सौ फीट ऊंची दीवार
लेफ्टिनेंट वॉकर, जो पीछे दौड़ा लक्ष्मीबाई को पकड़ने
हाय! बेचारा बे-मौत मारा गया कालपी की डगर में।

कालपी पहुंचकर रानी ने अपनों का मनोबल बढ़ाया
देशभक्ति के लिए, बुझ रही ज्वाला को फिर भड़काया
किया ग्वालियर पर अधिकार, मराठा ध्वज फहराया
अंग्रेजभक्त सिंधिया को ग्वालियर से खदेड़ भगाया।

फिर सर ह्यूरोज ने, रानी को ग्वालियर में घेर लिया
पत्र लिखकर लक्ष्मीबाई को, समर्पण करने का आदेश दिया
रानी ने भी प्रतिउत्तर में बहुत सुंदर जवाब दिया
सर झुकाने की जगह, युद्ध को प्रथम स्थान दिया।

स्वाभिमान के लिए, फिर रण में कूद पड़ी मर्दानी
बरछी, ढ़ाल, कटार, कृपाण से थी आज सज्ज भवानी
आया जनरल स्मिथ सामने, दिया उसको ललकार
लेकिन लक्ष्मीबाई हो गयी, स्वयं छल का शिकार।

अकेला पाकर उनको, सबने चारों ओर से घेर लिया
उस वीरांगना पर सबने मिलकर एक साथ प्रहार किया
फिर लड़ते-लड़ते गोली लगी और गिरी सिंहनी रणभूमि में
ऐसी वीरांगना नहीं जन्मी फिर, भारतवर्ष के किसी और कोने में।

मातृभूमि की रक्षा करने, जन्मी एक मर्दानी थी
अदम्य साहस लेकर रण में कूदी भवानी थी
दूर फिरंगी को करने उसने मन में ठानी थी
जन-जन के सीने में आजादी की आग उसे भडकानी थी।“
: संदीप शिवहरे

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