घनी अंधेरी रात







“घनी अंधेरी रात
छंटने लगी,
होने लगी प्रभात;
सूरज की किरणें
पड़ने लगी
दूर हो रहा
मन का विकार;
मन जो था
तम से घिरा,
निडर हुआ आज
फिर से,
उद्गम होने लगे
निर्मल स्वच्छ विचार;
एक-एक कर
मुकुल खिलने लगे
थाम,
शीतल चांदनी का हाथ;
आंधियां थमने लगी
और देखो,
फिर होने लगी प्रभात।“
: संदीप शिवहरे

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