प्रेम जगत की रीत है








“प्रेम जगत की रीत है, प्रेम ही है संगीत।
प्रेम करुणा का सागर, प्रेम स्नेह का द्वार।।

प्रेम तो शाश्वत है, प्रेम ही निश्छल अनुराग।
प्रेम तो बस सत्य है, प्रेम ही पवित्र प्रकाश।।

प्रेम त्याग का नाम है, प्रेम सहज ज्ञान है।
प्रेम वात्सल्य की चादर, प्रेम समाधान है।।

प्रेम निराकार है, प्रेम ही हरसिंगार है ।
प्रेम तो आनंद है, प्रेम उन्मुक्त विचार है।।

प्रेम धरा पे चांदनी, प्रेम तो जीवन है।
प्रेम अमृत की बूंद सा, प्रेम तो विश्वास है।।
: संदीप शिवहरे

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