रिश्तो की महफिल मे

" रिश्तो की महफिल मे अपने ही अपनो के पीछे पडे हैं
कौन किस पर भरोसा करे इस बात मे उलझे पडे हैं।

माँ-बाप की जायदाद पर बडी शान से हक जताते हैं
बुढ़ापे मे कलह मचाकर उन्हे खून के आँसू रुलाते हैं।

खुद तो भौहे ताने रंगबाजी मे कॉलर उठाये होटल जाते है
और अपने ही कुटुंब को तिल-2 तडपाकर भूखे पेट सुलाते हैं।

एक भाई कहता माँ जब तक हैं, तब तक है तेरा मेरा साथ
माँ जिस दिन गये, समझ खण्ड-2 हो गया रिश्तो का बाज़ार।

दूसरा सोचता कब मरे तो सारी जायदाद मेरी हो, और
तीसरा कहता कि जल्दी अब देहरी मे दीवार खडी हो।

रिश्तो की महफिल मे अपने ही अपनो के पीछे पडे हैं
कौन किस पर भरोसा करे इस बात मे उलझे पडे हैं।।"


: संदीप शिवहरे

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