“भींगी आंखों से भारत मां पूंछ रही सत्ता के गलियारों से कि कब तक यूं फेसबुक और ट्विटर में तर्क-वितर्क में समय गवाओगे देशभक्ति के झूठे नारे और लोगों में झूठी अलख जगाओगे आखिर कितना और खाओगे और ये बताओ, कहां बचाकर ले जाओगे। दोषी चाहे जो भी हो- देश के अंदर हो या बाहर हो आखिर तुम सब कब तक, यूंही मेरे बेटों की शहादत पर शोक मनाओगे नहीं, ये वक्त नहीं है रोने का, आपस में तर्क-वितर्क और संवाद का ये वक्त है साथ मिल खड़े होने का, उनकी शहादत का बदला लेने का। इस बार तुम देना ऐसा जवाब दुश्मन को कि उसकी रूह भी कांप जाए जिहाद आखिर क्या होता है उसका मतलब वो भली-भांति समझ जाए और जंग का इतना ही शौक है उन्हे, तो एक बार वीरों को सरहद में ललकारें हर एक शेर सौ-सौ पर भारी पड़ेगा, वो इतना अच्छे से गांठ बांध लें। भींगी आंखों से भारत मां पूंछ रही सत्ता के गलियारों से कि कब तक यूं फेसबुक और ट्विटर में तर्क-वितर्क में समय गवाओगे देशभक्ति के झूठे नारे और लोगों में झूठी अलख जगाओगे आखिर कितना और खाओगे और ये बताओ, कहां बचाकर ले जाओगे।।“ : संदीप शिवहरे
लक्ष्मीबाई, एक वीरांगना और उनकी अविस्मरणीय जीवनगाथा। “मातृभूमि की रक्षा करने, जन्मी एक मर्दानी थी अदम्य साहस लेकर रण में कूदी भवानी थी दूर फिरंगी को करने उसने म न में ठानी थी जन-जन के सीने में आजादी की आग उसे भडकानी थी। बचपन में ही मणिकर्णिका, सबकी प्रिय छबीली थी भागीरथी और मोरोपंत की, संतान वह अकेली थी पेशवा के राज्य में सीखी शस्त्रकला अलबेली थी बरछी, ढ़ाल, कटार, कृपाण यही उनकी प्रिय सहेली थी। मल्लविद्या, घुड़सवारी में भी न उनकी कोई हमजोली थी शिवाजी महाराज की गाथाएं सुनकर बड़ी हुई छबीली थी बूंद-बूंद रक्त कर दिया समर्पित, जिसने मातृभूमि के चरणों में ऐसी रानी नहीं जन्मी फिर, भारतवर्ष के किसी और कोने में। मातृभूमि की रक्षा करने, जन्मी एक मर्दानी थी अदम्य साहस लेकर रण में कूदी भवानी थी दूर फिरंगी को करने उसने मन में ठानी थी जन-जन के सीने में आजादी की आग उसे भडकानी थी। फिर गंगाधर का विवाह प्रस्ताव, पहुंचा पेशवा के दरबार मोरोपंत सब सुन हर्षित हुए, रिश्ता किया स्वीकार बिगुल बजे, ढ़ोल बजे, बजे एक-एक करके साज रानी के विवाह में पुलकित आज पूरा मराठा साम्राज...
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