अजीब इज़्तिराब है उनसे मिलने की
"अजीब इज़्तिराब है उनसे मिलने की
पर ये शाम है कि ढलती नही।
रात भर करवट बदलते रहते है
बूँद है कि समुन्दर से मिलती ही नही।
हर रोज सोचते है उनसे बात करने को
पर ये बन्द जुबॉ खुलती ही नही।
दिल देखकर झूम जाता है जिन्हे
ये आरजू है कि मिटती ही नही।
और अफसाने मेरे झूठे ही सही
पर उमंगे है कि थमती ही नही।
अफसाने मेरे झूठे ही सही
पर उमंगे है कि थमती ही नही।।"
: संदीप शिवहरे
पर ये शाम है कि ढलती नही।
रात भर करवट बदलते रहते है
बूँद है कि समुन्दर से मिलती ही नही।
हर रोज सोचते है उनसे बात करने को
पर ये बन्द जुबॉ खुलती ही नही।
दिल देखकर झूम जाता है जिन्हे
ये आरजू है कि मिटती ही नही।
और अफसाने मेरे झूठे ही सही
पर उमंगे है कि थमती ही नही।
अफसाने मेरे झूठे ही सही
पर उमंगे है कि थमती ही नही।।"
: संदीप शिवहरे
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