मैं चलूंगा, बढूंगा, आगे बढ़ता चलूंगा









“मैं चलूंगा, बढूंगा, आगे बढ़ता चलूंगा
सूरज की तरह न सही, तो न सही
दीये की तरह जगमगाता चलूंगा
मैं चलूंगा, बढूंगा, आगे बढ़ता चलूंगा।

हैं जो तिमिर छाया मेरे ज़हन में
जुगनू बन उसे खुद से दूर करुंगा
अब तो ठान लिया मन मे, अब तो मैं
एक प्रदीप्त कल का आगाज़ करुंगा।

सृष्टा तो नहीं मैं अपने भाग्य का
पर आलोक अपना मन करुंगा
दोस्ती की अद्भुत मिसाल बन
दिलों पर सबके राज करुंगा।

मैं चलूंगा, बढूंगा, आगे बढ़ता चलूंगा।
सूरज की तरह न सही, तो न सही
दीये की तरह जगमगाता चलूंगा
मैं चलूंगा, बढूंगा, आगे बढ़ता चलूंगा।।“
: संदीप शिवहरे

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