माँ " मेरी दुनियॉ

"माँ "
मेरी दुनियॉ
ममता की मूरत
स्नेह की पराकाष्ठा
माँ, मेरी दुनियॉ......।

माँ के होने पर हलचल,
हरा-भरा मेरा घर
न होने पर बेजान,
खोखला और खण्डहर मेरा घर।

माँ घर पर,
तुलसी का जैसे वृक्ष
बरगद की छाया
गंगा जैसा निर्मल जल।

नन्हे-नन्हे डगमगाते कदमो को
माँ ने ही चलना सिखाया
सच बोलू तो
माँ ने भली भाँति सम्भलना सिखाया।

दिन भर की थकान से
हो जाता जब मै चूर,
माँ लगाती हाथ जरा
हो जाती सारी पीर चूर।

खुद भूखी रहकर
हमे भर-पेट भोजन कराती,
हमे खुश देखने को
अपनी सारी वेदना छिपाती।

जब देखती अगर पीढा मे हमे
वो आकर मेरे बालो को
सहलाती, हमे समझाती
कुछ गीत और लोरीयॉ सुनाती
माँ, मेरी दुनियॉ......।

माँ के ज्ञान और समझ से
बढकर दूसरा कोई न वेद,
माँ, ममता का अथाय-सागर
माँ मे ही सारे देव।

: संदीप शिवहरे

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