कृत्य ऐसे कीजिए, रोम-रोम हर्षाए
“कृत्य ऐसे कीजिए, रोम-रोम हर्षाए।
अपनों को सुख दीजिए, छोड़ के वैर-भाव।।
न चुनें मार्ग वो जिससे अपने हो हताश।
अपनों को सुख दीजिए, छोड़ के वैर-भाव।।
न चुनें मार्ग वो जिससे अपने हो हताश।
उनकी आंखों का आंसू बन सकता है श्राप।।
समय रहत समझिए अपनों से है संसार।
मन को पवित्र रखते अपनों के संस्कार।।
संस्कार बिना देह ज्यों मिट्टी के समान।
एक-एक ईंट से है बना अदभुत ये मकान।।
ईश्वर की रचना का मत बनाओ मजाक।
अपनों को सुख दीजिए, छोड़ के वैर-भाव।।“
: संदीप शिवहरे
समय रहत समझिए अपनों से है संसार।
मन को पवित्र रखते अपनों के संस्कार।।
संस्कार बिना देह ज्यों मिट्टी के समान।
एक-एक ईंट से है बना अदभुत ये मकान।।
ईश्वर की रचना का मत बनाओ मजाक।
अपनों को सुख दीजिए, छोड़ के वैर-भाव।।“
: संदीप शिवहरे

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