देखकर मुस्कुराहट तुम्हारी



“देखकर मुस्कुराहट तुम्हारी दिल को सुकूं मिलता है
हर्फ़-दर-हर्फ संजोकर ग़ज़ल लिखने का दिल करता हैं
लेकिन सोचता हूं क्या लिखूं तुम पर, तुम्हारी सुंदरता पर
कितने तो पृष्ठ भर चुका, पर न जाने क्यों कम ही लगता है।“
: संदीप शिवहरे


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