फुटपाथ में कदम रखो जरा सम्भल-2 के

फुटपाथ में कदम रखो जरा सम्भल-2 के
कोई पैरों तले न आ जाए, चलो सम्भल के।

है ख़्वाबों की नगरी ये भी किसी गरीब की
रोटी कमाते हैं लोग यहां, अपने-२ नसीब की।

मुफलिसी में भी साथ नहीं छोड़ते, गरीब जरुर है
लेकिन जनाब, ग़ुरबत में भी ये हाथ नहीं छोड़ते।

न-उम्मीदी में भी यें, आस नहीं खोते हैं
अपने सपनों के पीछे, ये लोग कोसों पैदल चलते हैं।

न जेब में रुपए होते, न तन में ढंग का लिबास,
फिर भी स्त्री करके पहनते, चहेरे पर खिलखिलाता लिबास।
: संदीप शिवहरे

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